राजस्थान की संस्कृति है भारत की सबसे खूबसूरत संस्कृति1222

सूचना एवं जनसंपर्क विभाग पर फिर उठी उंगलियां
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02-10-2026

राजस्थान के सूचना एवं जनसंपर्क विभाग की कार्यप्रणाली पर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। स्थानीय प्रतिभाओं, क्षेत्रीय पत्रकारों और प्रदेश के अपने सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स की घोर उपेक्षा करते हुए विभाग ने सरकारी योजनाओं के प्रचार-प्रसार के लिए असम से आए इन्फ्लुएंसर्स के एक दल पर लाल कालीन बिछा दी है। गुरुवार को सूचना एवं जनसंपर्क विभाग के आयुक्त राकेश शर्मा ने इस बाहरी दल से मुलाकात की, जिसे लेकर अब राजस्थान के मीडिया और डिजिटल क्रिएटर गलियारों में तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है। यह पूरा घटनाक्रम प्रसिद्ध कहावत 'घर का जोगी जोगणा, आन गांव का सिद्ध' यानी अपने घर के ज्ञानी की कद्र न कर बाहरी को महान मानना को पूरी तरह चरितार्थ करता है।—स्थानीय हुनर की अनदेखी, बाहरी लोगों पर मेहरबानीराजस्थान में कला, संस्कृति, पर्यटन और डिजिटल मीडिया के क्षेत्र में काम करने वाले हजारों स्थानीय युवा और इन्फ्लुएंसर्स मौजूद हैं, जो बिना किसी सरकारी मदद के वर्षों से मरुधरा की विरासत को वैश्विक पटल पर पहचान दिला रहे हैं। वे यहां की भौगोलिक स्थिति, जनता की नब्ज और जन-कल्याणकारी योजनाओं के जमीनी असर को बाहरी लोगों की तुलना में कहीं बेहतर समझते हैं। इसके बावजूद, विभाग ने प्रदेश की फ्लैगशिप योजनाओं, नीतियों और नवाचारों की जानकारी देश के सुदूर कोने (असम) से आए उन लोगों को देने में दिलचस्पी दिखाई, जिनका राजस्थान के जमीनी धरातल और स्थानीय जनता से कोई सीधा जुड़ाव ही नहीं है। विभाग की यह नीति दर्शाती है कि उसे अपने राज्य की प्रतिभाओं पर भरोसा नहीं है।असम से आया यह दल 27 सितंबर से 2 अक्टूबर तक राजस्थान के विभिन्न संभागों और जिलों का शाही भ्रमण कर रहा है। सरकारी तंत्र इस बात पर अपनी पीठ थपथपा रहा है कि वे असम और राजस्थान की कला-संस्कृति का आदान-प्रदान कर रहे हैं। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि जनता के टैक्स के पैसे से प्रायोजित इस "भ्रमण" का राजस्थान की आम जनता को क्या लाभ मिलने वाला है? क्या असम के इन्फ्लुएंसर्स राजस्थान के गांवों में जाकर भामाशाह, चिरंजीवी या केंद्र-राज्य की अन्य योजनाओं का लाभ पात्र लाभार्थियों तक पहुंचाएंगे? बिल्कुल नहीं। यह महज एक पीआर स्टंट और सरकारी खजाने की फिजूलखर्ची है, जिसका मकसद केवल कागजी रिपोर्ट तैयार करना है।—विभागीय कार्यप्रणाली और खोखला प्रचारमुलाकात के दौरान आयुक्त ने बड़े गर्व से विभाग की विभिन्न शाखाओं और संचार माध्यमों के जरिए जन-जन तक नीतियां पहुंचाने की कार्यप्रणाली का प्रदर्शन किया। लेकिन हकीकत यह है कि स्थानीय मीडिया और संवाददाताओं को आज भी जरूरी सूचनाओं और विज्ञापनों के लिए संघर्ष करना पड़ता है। विभाग अपनी कमियों को छिपाने के लिए बाहरी लोगों से "सुझाव आमंत्रित" कर रहा है, जबकि स्थानीय स्तर पर उठ रही वाजिब मांगों और समस्याओं को ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है। जब तक किसी योजना का प्रचार स्थानीय भाषा, बोली और स्थानीय चेहरों के माध्यम से नहीं होगा, तब तक वह राजस्थान के अंतिम छोर पर बैठे व्यक्ति तक प्रभावी ढंग से नहीं पहुंच सकती।—मुद्दे की बातअसल में असम के इन्फ्लुएंसर्स के इस दौरे ने यह साफ कर दिया है कि सूचना एवं जनसंपर्क विभाग "ग्लोबल" दिखने की होड़ में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा शुरू किया गया अभियान 'वोकल फॉर लोकल' को भूला दिया है जिसका उद्देश्य स्थानीय उत्पादों को खरीदना, उनका उपयोग करना और उन्हें बढ़ावा देना है। अपने राज्य के प्रतिभावान युवाओं को दरकिनार कर बाहरी लोगों से राज्य की विशिष्टताओं पर चर्चा करना न सिर्फ स्थानीय हुनर का अपमान है, बल्कि प्रशासनिक अदूरदर्शिता का भी प्रमाण है। अगर सरकार वास्तव में अपनी योजनाओं को प्रभावी, पारदर्शी और नागरिक-केंद्रित बनाना चाहती है, तो उसे 'आन गांव के सिद्धों' की चमचागिरी छोड़ अपने 'घर के जोगियों' को पहचाननी होगी और उन्हें सशक्त करना होगा। अन्यथा, यह करोड़ों रुपये का प्रचार तंत्र केवल कुछ चुनिंदा लोगों के भ्रमण और फोटो खिंचवाने का जरिया बनकर रह जाएगा। आयुक्त की इस हरकत ने मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा की प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और स्थानीय मीडिया के प्रति आस्था को भी ठेस पहुंचाई है।